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Theme of the week

Issue LXXI (10.06.2012)


Women can Reduce Stress in the Society

The Human Life continuously needs two types of power. The power to make things move outside and the power to make things move inside the person. The former is a masculine quality and it makes us active and enterprising. It brings us success and money. The latter is a feminine quality and gives a person sensitivity and patience. It gives us internal power and an ability to maintain relations. All of us have both the qualities. However, generally masculine quality is more in men while the feminine quality is more in women. This is the reason that traditionally, the responsibility of earning and bringing physical development outside has been entrusted upon men while the roles of taking care of family members, bringing up children, etc. are the basic roles of women.

A highly mature and committed person has both masculine and feminine qualities in high degrees. On the other hand, there are many who do not have any of these qualities in a sufficient way. They need others’ support throughout their life. In a family, if one is rich in terms of masculine quality and the other is rich in terms of feminine quality, both are able to make a happy family by giving the necessary support to each other. However, if both husband and wife are weak in terms of inner power and enterprising quality, there is lot of stress in the family.

Children generally need parents’ support because they need a lot of exposure to polish these qualities which are within them as a seed. When a child is a kid or a teenager, we cannot expect him or her to be mature. Therefore, the parents should become their role models by showing a lot of patience, understanding and sense of responsibility. 

At the macro level, the increasing complexities of life are giving less and less opportunity to men, women and children to exercise their inner qualities. The financial pressures, the knowledge explosion and the challenge to be successful is asking everyone to be enterprising and not understanding. This is creating imbalance in life. Women are also required to support men in bearing the financial responsibilities by being more enterprising. The number of nuclear families and dual career families is increasing and practically very few people are able to look at the humane aspects of various decisions and events.   This is the root cause of increasing stress.  In such a situation, both men and women should play a dual role and work continuously to increase their inner power and other feminine qualities. Since women have been bestowed upon these qualities more liberally, they should take this extra responsibility happily and should work actively for reducing stress in the society. Elderly women and men can also play a significant role in this regard. The world today needs more of mature and committed people (especially women and elderly people having high degree of feminine quality and inner strength) who can disperse the anxiety getting deposited in the system of people and make the world a more cohesive place.

Hindi

स्त्रियाँ कर सकती हैं तनाव कम
मानव जीवन में निरंतर दो प्रकार की शक्तियों की आवश्यकता होती है. एक बाह्यगामी शक्ति जो मानव को क्रियाशील एवं गतिमान बनाती है. ये शक्ति पुरुषार्थ दर्शाती है. संसार में समस्त बाहरी विकास एवं सफलता प्राप्ति के लिए बाह्यगामी शक्ति की आवश्यकता होती है.
दूसरी अंतर्मुखी शक्ति है जो हमें आत्मबल एवं सहन शक्ति देती है. अंतर्मुखी शक्ति एक दूसरे को समझने व स्वीकार करने में सहायक होती है. यह स्त्रैण गुण दर्शाती है. दोनों प्रकार की शक्तियाँ प्रत्येक मानव में होती है, किंतु बाह्यगामी शक्ति (पुरुषार्थ) अधिकांशतः पुरुषों में अधिक मात्रा में पाया जाती है जबकि आंतरिक शक्ति व स्त्रैण गुण प्रायः स्त्रियों में अधिक होता है. यही कारण है कि पारंपरिक तौर पर पुरुष परिवार को आर्थिक सुविधा व सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी उठाते हैं जबकि स्त्रियाँ अधिकांशतः परिवार के सदस्यों की देखभाल एवं बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेती हैं.
एक विवेकशील एवं निष्ठावान व्यक्ति में पुरुषार्थ व अंतर्मुखी शक्ति दोनों प्रचुर मात्रा में होते हैं. दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते है जिनमें इन दोनों शक्तियों का अभाव होता है. ये लोग जीवन पर्यंत दूसरों पर आश्रित रहते हैं. एक परिवार में यदि एक व्यक्ति पुरुषार्थ का धनी है एवं दूसरा आंतरिक शक्ति या स्त्रैण गुणों का धनी है तो वे दोनों एक दूसरे के पूरक बन कर एक स्वस्थ एवं खुशनुमा परिवार का निर्माण कर सकते हैं. किंतु यदि पुरुषों एवं स्त्री दोनों में दोनों प्रकार के गुणों की कमी है तो परिवार में अधिकांशतः तनाव रहता है.
बच्चों में दोनों ही प्रकार के गुण बीज के रूप में विद्यमान होते है. किंतु वे जब बङे होकर विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारी उठाते हैं तभी यें शक्तियाँ परिपक्व हो पाती हैं. अतः माता-पिता को बच्चों के उचित विकास के लिये एक ओर उन्हें भावनात्मक सुरक्षा देनी चाहिये एवं साथ ही उनका मार्गदर्शन करना चाहिये. यदि माता-पिता के स्वयं के व्यवहार से पुरुषार्थ तथा अंतः शक्ति एवं भावनात्मक परिपक्वता परिलक्षित होती है तो बच्चों में स्वत ही इन गुणों का विकास हो जाता है. वर्तमान जीवन शैली की जटिलताएँ पुरुष, स्त्री, एवं बच्चों—सभी को आंतरिक शक्ति एवं भावनात्मक गुणों का विकास करने का अधिक अवसर नहीं देती है. बढ़ता हुआ आर्थिक बोझ, उच्च शिक्षा की आवश्यकता एवं सफलता की बदलती हुई परिभाषा केकारण आज प्रत्येक व्यक्ति अपने ऊपर बाहरी जगत में सफल होने के लिये दबाव महसूस करता है.
बढ़ती हुई आर्थिक आवश्यकताओं एवं बाहरी जगत में सफल होने के दबाव के रहते स्त्रियाँ स्त्रैण गुण की अपेक्षा सिर्फ पुरुषार्थ एवं क्रियाशीलता विकसित करने की ओर आकर्षित होती हैं. इस तरह समाज में भावनात्मक असुरक्षा बढ़ती जा रही है. संयुक्त परिवारों के टूटने एवं स्त्री—पुरुष दोनों के नौकरीपेशा होने की स्थिति में ऐसे लोगों की कमी होती जा रही है जो परिवार के सदस्यों का मनोबल बढ़ा सकें एवं स्नेहपूर्ण वातावरण विकसित करें. यही वजह है कि समाज में हर ओर व्यक्ति तनावग्रस्त नज़र आता है.
ऐसी परिस्थिति में स्त्री व पुरुष दोनों को ही अपने में पुरुषार्थ के साथ—साथ आंतरिक शक्ति व स्त्रैण गुण का विकास करना चाहिये. चूंकि प्रकृति ने स्त्रैण गुण नारी को अधिक मात्रा में दिये हैं अतः उनके लिये ये दोहरी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना अधिक सहज है.
नौकरीपेशा होने पर भी स्त्रियों को (साथ ही पुरुषों को भी) प्राथमिक तौर पर परिवार एवं समाज में भावनात्मक सुरक्षा का वातावरण बनाने का प्रयत्न करना चाहिये. परिवार के बङे—बुजुर्ग भी यह भूमिका आसानी से निभा सकते हैं. आज समाज में अधिक से अधिक भावनात्मक रूप से परिपक्व एवं संवेदनशील लोगों की आवश्यकता है जो हर ओर बढ़ते हुए तनाव को कम करने के लिये क्रियाशील हो सकें. स्त्रियाँ यदि अपने सहज गुण एवं अपनी प्रथम भूमिका को पूर्ण रूप से स्वीकार करें तो हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकतें हैं जहाँ सभी एक दूसरे के अस्तित्व को खुशी से स्वीकार करें.

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B Rastogi Dear Rajeev ji, you are right. Personal Experience is the best teacher. We read and learn theories but realize their real significane only when experience personally. I'm personally impressed by the article and also support each line of it. Masculine and Feminine, both qualities are vital. A perfect balance between the two makes home and in tern society, a better place.

                    
rajeev Good article with thoughts from personal experiences.
 
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